रूप चतुर्दशी आज: औषधि स्नान और यम दीपदान के शुभ मुहूर्त और पूजा विधि
जीवन मंत्र डेस्क. हिंदू कैलेंडर के कार्तिक महीनेके कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को रूप चतुर्दशी के रूप मेंमनाया जाता है। भविष्य पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर अभ्यंग यानी तेल मालिश कर के औषधि स्नान करना चाहिए। ऐसा करने से लक्ष्मीजी प्रसन्न होती हैं, स्वास्थ्य सुख मिलता है, उम्र बढ़ती हैं और नरक के भय से भी मुक्ति मिल जाती है। वहीं, शाम को धर्मराज यम की पूजा और दीपदान करने से अकाल मृत्यु नहीं होती।
- कैसे करें स्नान
नरक चतुर्दशी कोसूर्योदय से पहले उठकर नहाना चाहिए। सूर्योदय से पहले तिल्ली के तेल से शरीर की मालिश करनी चाहिए, इसके बाद अपामार्ग का प्रोक्षण यानी अपामार्ग को शरीर पर घुमाना चाहिए। लौकी के टुकडे़ और अपामार्ग दोनों को अपने सिर के चारों ओर सात बार घुमाएं। इसके बाद लौकी और अपामार्ग को घर के दक्षिण दिशा में विसर्जित कर देना चाहिए। फिर स्नान करना चाहिए। पद्म पुराण में इसके लिए श्लोक लिखा है।
पद्मपुराण का मंत्र
सितालोष्ठसमायुक्तं संकटकदलान्वितम।
हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाण: पुन: पुन:॥
अर्थातहे तुम्बी (लौकी)।हे अपामार्ग। तुम बार बार फिराए जाते हुए मेरे पापों को दूर करो और मेरी कुबुद्धि का नाश कर दो।
अभ्यंग स्नान मुहूर्त
- सुबह 05:15 से 06:33
- सुबह 07:35 से 09:15 तक
अन्य शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त
- दोपहर 01:30 से शाम 04:15 तक
यम पूजा और दीपदान मुहूर्त
- शाम 05:40 से 07:10 तक
- स्नान का महत्व
भविष्यपुराण के अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को जो व्यक्ति सूर्योदय के बाद स्नान करता है, उसके पिछले एक वर्ष के समस्त पुण्य कार्य समाप्त हो जाते हैं। इस दिन स्नान से पूर्व तिल्ली के तेल की मालिश करनी चाहिए, वैसे तोकार्तिक मास में तेल की मालिश करनी ही नहीं चाहिए, लेकिन नरक चतुर्दशी पर इसका विधान है। नरक चतुर्दशी को तिल्ली के तेल में लक्ष्मीजी और जल में गंगाजी का निवास माना गया है। पद्मपुराण में लिखा है-जो मनुष्य सूर्योदय से पूर्व स्नान करता है, वह यमलोक नहीं जाताअर्थातनरक का भागी नहीं होता है। इससे रूप बढ़ता है और शरीर स्वस्थ्य रहता है। नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले स्नान करने से मनुष्य नरक के भय से मुक्त हो जाता है।
- कैसे करें दीपदान और यम पूजन
यम दीपदान करने के लिए हल्दी मिलाकर गुंथे हुए गेहूं के आटे से बने विशेष दीप का उपयोग किया जाता है। यम दीपदान प्रदोष काल में करना चाहिए। इसके लिए आटे का एक बड़ा दीपक लें और उसमें स्वच्छ रुई लेकर दो लम्बी बत्तियां रख लें। उन्हें दीपक में एक-दूसरे पर आड़ी इस प्रकार रखें कि दीपक के बाहर बत्तियों के चार मुंह दिखाई दें। अब उसे तिल के तेल से भर दें और साथ ही उसमें कुछ काले तिल भी डाल दें।
इस प्रकार तैयार किए गए दीपक का रोली, अक्षत एवं पुष्प से पूजन करें। उसके बाद दक्षिण दिशा की ओर देखते हुए नीचे लिखा मंत्र बोलें। मंत्र बोलते हुए चार मुंह वाले दीपक को खील अथवा गेहूं की ढेरी बनाकर उस पर रखें। दीपक रखने के बाद हाथ में फूल लेकर फिर से ये मन्त्र बोलते हुए यमदेव को दक्षिण दिशा में नमस्कार करें।
- मंत्र
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतामिति ।।
अर्थ - त्रयोदशी को दीपदान करने से मृत्यु, पाश, दण्ड, काल और लक्ष्मी के साथ सूर्यनन्दन यम प्रसन्न हों ।
- दीपदान और यम पूजन का महत्व
कार्तिक माह की चतुर्दशी तिथि पर धर्मराज यम को प्रसन्न करने के लिए सूर्यास्त के बाद दक्षिण दिशा में यम पूजा और दीपदान करना चाहिए। ऐसा करने से यमराज प्रसन्न होते हैं। यमराज प्रसन्न होकर आरोग्य और लंबी उम्र का आशीर्वाद देते हैं। यम पूजा और दीपदान से कभी अकाल मृत्यु नहीं होती है। इसके साथ ही जाने-अनजाने में किए गए हर तरह के पाप भी खत्म हो जाते हैं। जिससे परिवार पर किसी भी तरह की विपत्ति नहीं आती।
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