रिस्क लेने की क्षमता के आधार पर ही करें ईटीएफ या एक्टिव फंड का चयन
यूटिलिटी डेस्क. निवेश से जुड़े फैसलों पर निवेशक की भावनाओं और मनोविज्ञान का असर होता है। इसलिए अक्सर यह सवाल उठता है कि म्यूचुअल फंड में निवेश की रणनीति क्या हो? क्या पैसिव तरीके से मैनेज किए जाने वाले ईटीएफ में निवेश करना चाहिए या फिर एक्टिव तरीके से मैनेज होने वाले फंड पर भरोसा करना चाहिए? निवेश की इन दोनों रणनीति के अपने-अपने फायदे और नुकसान हैं।
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इस तरीके में कोशिश होती है कि निवेश से मिलने वाला रिटर्न बेंचमार्च इंडेक्स से मिलने वाले रिटर्न से ज्यादा हो। इन फैसलों के लिए काफी रिसर्च और मार्केट ट्रेंड के विश्लेषण की जरूरत होती है। सेक्टर का चुनाव और निवेश की टाइमिंग का भी खासा महत्व होता है। हालांकि, इतना सब करने के बावजूद मार्केट की चाल और स्टॉक की कीमत का नियमित तौर पर पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं होता है। एक्टिव निवेश आसान काम नहीं है, इसलिए इसके लिए प्रोफेशनल फंड मैनेजर की जरूरत पड़ती है। फंड मैनेजर पोर्टफोलियो में मौजूद कंपनियों को लेकर सतर्क रहते हैं और कई कंपनियों को वॉच लिस्ट में रखते हैं।
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ईटीएफ इन्वेस्टिंग को पैसिव निवेश भी कहा जाता है। इस तरीके के तहत बेंचमार्च इंडेक्स के पोर्टफोलियो पैटर्न को ट्रैक किया जाता है। उदाहरण के तौर पर निफ्टी ईटीएफ में एनएसई निफ्टी 50 में मौजूद सभी स्टॉक समान अनुपात में शामिल होंगे। चूंकि पैसिव तरीके से निवेश करने वालों को बेंचमार्क इंडेक्स के प्रदर्शन को ही हासिल करना होता है, लिहाजा इस पर आने वाला खर्च एक्टिव निवेश की तुलना में कम होता है। इन खर्चों में सालाना पोर्टफोलियो मैनेजमेंट चार्ज, एक्सपेंस रेशियो, ब्रोकरेज और ट्रांजेक्शन लागत आदि शामिल होते हैं। पैसिव निवेशक मार्केट क्षमता में यकीन करते हैं और इसी आधार पर पोर्टफोलियो तैयार करते हैं। इस तरह वे स्टॉक और फंड मैनेजर से जुड़े रिस्क कम करने में सफल होते हैं। गोल्ड ईटीएफ, सेंसेक्स ईटीएफ, मिडकैप ईटीएफ आदि पैसिव इन्वेस्टिंग के उदाहरण हैं।
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कम रिस्क लेना है तो पोर्टफोलियो का कोर ईटीएफ से तैयार करना चाहिए। कोर के अलावा बाकी हिस्सा सैटेलाइट कहलाता है। इसके लिए निवेशक कुछ एक्टिवली मैनेज्ड फंड का चुनाव कर सकता है। अगर रिस्क लेने की क्षमता ज्यादा है तो पोर्टफोलियो का कोर एक्टिवली मैनेज्ड फंड का हो और सैटेलाइट हिस्सा ईटीएफ का होना चाहिए।
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