क्रोध, लालच और दूसरों से आगे बढ़ने की इच्छा की वजह से नहीं मिल पाती है मन को शांति
- सेठ ने संत से कहा कि गुरुजी मेरे पास सुख-सुविधा की हर चीज है, घर-परिवार में भी सबकुछ ठीक है, लेकिन मेरे मन में शांति नहीं है। कृपया कोई ऐसा उपाय बताए, जिससे ये अशांति खत्म हो जाए। संत ने कहा कि ठीक हैं, मेरे पास इसका उपाय है। आप यहां बैठें और कुछ देर ध्यान करें। सेठ ने बात मानी और आंखें बंद करके वहीं बैठ गया। आंखें बंद होते ही उसके दिमाग में इधर-उधर की बातें घूमने लगी। क्रोध, लालच और प्रतिस्पर्धियों से आगे बढ़ने के विचार आने लगे। थोड़ी ही देर में उसने आंखें खोल लीं।
- संत समझ गए कि इसका मन ध्यान में नहीं लग रहा है। उन्होंने कहा कि मेरे साथ बाग में चलो। कुछ देर वहीं टहलते हैं। सेठ उनके साथ चल दिया। बाग में सुंदर गुलाब थे। सेठ ने गुलाब को तोड़ने के लिए हाथ आगे बढ़ाया तो उसे कांटा चुभ गया और वह चिल्लाने लगा। संत उसे लेकर तुरंत आश्रम में आए और हाथ में लेप लगाया। संत ने उससे कहा कि एक छोटे से कांटे की वजह से तुम्हें इतना दर्द हुआ है तो सोचा तुम्हारे मन में क्रोध, लालच, दूसरों से आगे बढ़ने की लालसा, अहंकार जैसे बड़े-बड़े कांटे चुभे हुए हैं। इनके दर्द की वजह से तुम्हें शांति कैसे मिल सकती है। जब तक ये कांटे नहीं निकलेंगे, तुम्हारा मन शांत नहीं होगा।
- सेठ को संत की बातें समझ आ गई और वह उनका शिष्य बन गया। धीरे-धीरे उसने इन बुराइयों को छोड़ दिया। अपने धन का उपयोग लोगों की भलाई के लिए करने लगा। कुछ ही समय में उसे मन की शांति मिल गई।
Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
from Dainik Bhaskar https://ift.tt/2XROWZa
No comments