सूर्योदय से पहले स्नान और अन्य परंपराओं का धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व
जीवन मंत्र डेस्क. 12 नवंबर से अगहन मास शुरू हो चुका है जो 13 दिसंबर तक रहेगा। इस महीने में ऋतु, ग्रह-नक्षत्र और मौसम को देखते हुए स्नान, दान और पूजा-पाठ को लेकर कई परंपराएं बनाई गई हैं। इनमें सूर्योदय से पहले उठना, नदी स्नान करना, शंख और श्रीकृष्ण पूजा बताई गई हैं। ये सभी परंपराएंधार्मिक और वैज्ञानिक नजरिए से भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।
अगहन मास की परंपराओं का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व
- अगहन मास में किए जाने वाले कर्म
इस महीने में सुबह जल्दी उठकर भजन-कीर्तन किए जाते हैं। सूर्योदय से पहले उठकर नदी स्नान और सूर्य के साथ पितरों को जल दिया जाता है। अगहन मास में शंख पूजा और श्रीकृष्ण पूजा का विशेष महत्व होता है। इस महीने में व्रत-उपवास के साथ दान और अन्य धार्मिक काम किए जाते हैं। इस महीने धार्मिक और शारीरिक नियमों का पालन करते हुए संयम से रहा जाता है।
- धार्मिक महत्व
अगहन मास में हेमंत ऋतु रहती है। इसे पितरों की ऋतु भी कहा गया है। यानी अगहन मास में सूर्योदय से पहले उठकर स्नान और पूजा-पाठ करने से पितृ प्रसन्न होते हैं। इस महीने में सूर्य वृश्चिक और धनु राशि में रहता है। सूर्य की इस स्थिति के प्रभाव से धर्म और परोपकार के विचार आते हैं। वहीं हेमंत ऋतु के दौरान मन भी शांत रहता है। शीतल वातावरण में मन प्रसन्न भी रहता है मन की ये स्थिति पूजा-पाठ और भगवद भजन के लिए अनुकूल मानी गई है।इसलिए अगहन मास में नदी स्नान और श्रीकृष्ण पूजा के साथ ही अन्य पूजा-पाठ एवं स्नान दान की परंपराए बनाई गई हैं।
- वैज्ञानिक महत्व
अगहन मास को रोग दूर करने वाला कहा गया है। इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण इस मास का अनुकूल वातावरण है। वर्षा ऋतु में आसमान बादलों से ढंका रहता है। ऐसे में कई सूक्ष्मजीव पनपते हैं और रोग फैलाते हैं। जब शरद ऋतु आती है तो आसमान साफ हो जाता है और सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर आती हैं, जिससे रोगाणु समाप्त हो जाते हैं और मौसम स्वास्थ्य के लिए अनुकूल हो जाता है। ताजी हवा, सूर्य की पर्याप्त रोशनी आदि शरीर को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाती है। यही कारण है कि अगहन मास में सुबह नदी स्नान का विशेष महत्व धर्म शास्त्रों में लिखा है। सुबह उठकर नदी में स्नान करने से ताजी हवा शरीर में स्फूर्ति का संचार करती है। इस प्रकार के वातावरण से कई शारीरिक बीमारियां खत्म हो जाती हैं।
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