देवी मां की रक्षा के लिए शिवजी ने लिया था काल भैरव अवतार, इन्हें क्यों चढ़ाते हैं मदिरा?
जीवन मंत्र डेस्क। मंगलवार, 19 नवंबर को काल भैरव अष्टमी है। प्राचीन समय में इस तिथि पर भगवान शिव ने देवी मां की रक्षा के लिए काल भैरव अवतार लिया था। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य और शिव पुराण कथाकार पं. मनीष शर्मा के अनुसार जब शिवजी का ये स्वरूप प्रकट हुआ तब उन्होंने भय (भै) बढ़ाने वाली रव यानी आवाज उत्पन्न की थी। इसीलिए इस रूपरूप को भैरव कहा जाता है। ये अवतार हमेशा देवी मां की रक्षा में तैनात रहता है। शिवजी ने इन्हें कोतवाल नियुक्त किया है। इसीलिए हर देवी मंदिर में काल भैरव भी होते हैं।जानिए काल भैरव से जुड़ी खास बातें...
- चढ़ाई जाती है तामसिक चीजें
पं. शर्मा के अनुसार काल भैरव की उत्पत्ति रात्रि काल हुई थी। इसीलिए इनकी पूजा रात में करने की परंपरा है। भैरव महाराज हमेशा युद्ध के मैदान में ही रहते हैं। युद्ध मैदान में खाने-पीने की चीजें नहीं मिलती हैं। इसीलिए इस स्वरूप को तामसिक चीजें जैसे मदिरा, राख, तेल, सिंदूर जैसी चढ़ाई जाती है। ये स्वरूप नकारात्मकता का नाश करने वाला होता है। इनका वास श्मशान में बताया गया है।
- क्यों चढ़ाते हैं मदिरा
काल भैरव युद्ध के मैदान में ही रहते हैं। आसुरी प्रवृत्तियों से युद्ध करते हैं, इस कारण इन्हें तामसिक चीजें अर्पित की जाती हैं। मदिरा चढ़ाने का भाव यह है कि हमें अपनी सभी बुराइयों, नशा करने की आदत को भगवान के सामने छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। काल भैरव को मदिरा चढ़ाकर प्रण लेना चाहिए कि अब से हम नशा नहीं करेंगे।
- कभी भी किसी जीव को न सताएं
भैरव भगवान का वाहन कुत्ता है। इस कारण अगर आप भैरव देव को प्रसन्न करना चाहते हैं तो कभी भी कुत्ते को या किसी अन्य जीव को परेशान न करें। अन्य जीवों को मारे नहीं, रोज सुबह-शाम रोटी खिलाएं। जो लोग कुत्ते को परेशान करते हैं, उनकी पूजा-पाठ सफल नहीं हो पाती है। पं. शर्मा के अनुसार कालभैरव अष्टमी पर किसी भैरव मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाएं। भगवान को सिंदूर चढ़ाएं। भैरव को शिवजी का क्रोधित स्वरूप माना जाता है। इसीलिए शिवजी के भक्तों को अधार्मिक कर्मों से बचना चाहिए।
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