दुख देने वाली बातों को जब तक याद रखेंगे तब तक निराशा दूर नहीं हो सकती
- गुरु ने शिष्य से कहा कि प्रश्न का उत्तर मैं तुम्हें वन में दूंगा। एक थोड़े बड़े पत्थर की ओर इशारा करते हुए गुरु ने कहा कि तुम ये पत्थर उठाओ और मेरे साथ चलो। शिष्य ने तुरंत ही आज्ञा मानते हुए पत्थर उठा लिया और गुरु के पीछे-पीछे चल दिया।
- कुछ दूर चलने के बाद पत्थर के वजन की वजह से शिष्य का हाथ दर्द करने लगा, लेकिन वह चुपचाप गुरु के पीछे चलता रहा। थोड़ी देर बाद हाथ का दर्द और बढ़ गया, लेकिन उसने गुरु के कुछ नही बोला। पत्थर उठाकर थोड़ी देर और चलने के बाद हाथ का दर्द असहनीय हो गया। शिष्य ने कहा कि गुरुजी अब मैं ये पत्थर और नहीं उठा सकता। गुरु बोले कि ठीक ये पत्थर यहीं रख दो।
- पत्थर रखते ही शिष्य को राहत मिली। गुरु ने कहा कि बस यही खुश रहने का मंत्र है। शिष्य बोला कि गुरुजी मैं आपकी बात नहीं समझा।
- गुरु ने समझाया कि जब तक हम दुखों का बोझ उठाए रहेंगे, हमें दुख और निराशा का ही सामना करना पड़ेगा। हमेशा खुश रहना चाहते हैं तो दुख देने वाली बातों को भूलकर आगे बढ़ना चाहिए। दुख के बोझ को जल्दी से जल्दी छोड़ देंगे तो हमेशा खुश रहेंगे। शिष्य को गुरु की बात समझ आ गई।
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