जब तक क्रोध, लालच, ईर्ष्या जैसी बुराइयां साथ रहेंगी, हम पूजा-पाठ में मन नहीं लगा सकते
- संत ने दुकानदार से डिब्बों की ओर इशारा करते हुए पूछा कि इन डिब्बों में क्या है? दुकानदार ने बताया कि किसी डिब्बे नमक है, किसी में मिर्ची है, किसी में हल्दी रखी है। इसके बाद संत ने दुकान में एक तरफ रखे डिब्बे की ओर इशारा किया और पूछा उसमें क्या है? दुकानदार ने कहा कि उसमें राम-राम है।
- संत ने हैरान होते हुए पूछा ये राम-राम नाम की कौन सी चीज है?
- दुकानदार ने जवाब दिया कि महाराज वो डिब्बा खाली है। हम खाली को खाली नहीं कहते हैं, उसे राम-राम कहते हैं।
- ये बात सुनते ही संत की आंखें खुल गई। संत को समझ आ गया कि जब तक हमारा मन खाली नहीं होगा, उसमें भगवान का वास नहीं हो सकता। जिन लोगों के मन में क्रोध, लालच, ईर्ष्या जैसी बुराइयां भरी हैं, उनमें भगवान कैसे रह सकते हैं।
इस छोटे से प्रसंग की सीख यह है कि जो लोग क्रोध, लालच, ईर्ष्या जैसी बुराइयों के घिरे हैं, उन्हें पूजा-पाठ में सफलता नहीं मिल सकती है। अगर हम सच्ची भक्ति करना चाहते हैं तो पहले इन बुराइयों से मुक्ति पानी होगी। तभी हमारा मन पूजा में लग पाएगा और हम भगवान की कृपा प्राप्त कर सकेंगे।
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