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22 अप्रैल को अमावस्या: चंद्र की सोलहवीं कला है अमा, इसमें रहती है सभी कलाओं की शक्तियां

बुधवार, 22 अप्रैल को वैशाख मास की अमावस्या है। इसे सतुवाई अमावस्या भी कहा जाता है। इस बार पंचांग भेद की वजह से कुछ क्षेत्रों में गुरुवार को भी अमावस्या मनाई जाएगी। हिन्दी पंचांग के अनुसार एक माह के दो भाग शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष होते हैं। शुक्ल पक्ष में चंद्र की कलाएं बढ़ती हैं यानी चंद्र बढ़ता है। कृष्ण पक्ष में चंद्र घटता है और अमावस्या पर पूरी तरह से अदृश्य हो जाता है। चंद्र की सोलह कलाओं में सोलहवीं कला को अमा कहा जाता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार जानिए अमावस्या से जुड़ी खास बातें...

स्कंदपुराण में लिखा है कि-

अमा षोडशभागेन देवि प्रोक्ता महाकला।

संस्थिता परमा माया देहिनां देहधारिणी।।

इस श्लोक के अनुसार अमा को चंद्र की महाकला गया है, इसमें चंद्र की सभी सोलह कलाओं की शक्तियां शामिल होती हैं। इस कला का क्षय और उदय नहीं होता है।

कब आती है अमावस्या

पं. शर्मा के अनुसार जब किसी एक राशि में सूर्य और चंद्र साथ होते हैं, तब अमावस्या तिथि रहती है। 22 अप्रैल को सूर्य और चंद्र मेष राशि में रहेंगे। अमावस्या तिथि के स्वामी पितृदेव माने गए हैं। इसलिए अमावस्या पर पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, श्राद्ध कर्म और दान-पुण्य करने का महत्व है। अमावस्या पर किसी पवित्र नदी में स्नान करने की परंपरा है। इस दिन मंत्र जाप, तप और व्रत करने की परंपरा है। इस साल कोरोनावायरस की वजह से देशभर में लॉकडाउन है, इस वजह से अपने घर पर ही पवित्र नदियों का ध्यान करते हुए स्नान करें और जरूरतमंद लोगों को धन-अनाज का दान करें।



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