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द्रोणाचार्य पुत्र मोह की वजह से अश्वथामा और कौरव-पांडवों के बीच करते थे भेदभाव, अश्वथामा को देने चाहते थे ज्यादा ज्ञान, लेकिन वह ब्रह्मास्त्र वापस लेने की विधि नहीं सीख सका

बच्चों को अत्यधिक मोह की वजह से परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। ये बात द्रोणाचार्य ओर अश्वथामा के प्रसंग से समझ सकते हैं। जानिए प्रसंग...

महाभारत में गुरु द्रोण को अपने पुत्र अश्वथामा से बहुत अधिक मोह था। इसी वजह से वे शिक्षा में भी अन्य छात्रों से भेदभाव करते थे। जब उन्हें सभी कौरव और पांडव राजकुमारों को चक्रव्यूह की रचना और उसे तोड़ने के तरीके सिखाने थे तो उन्होंने शर्त रख दी कि जो राजकुमार नदी से घड़ा भरकर सबसे पहले पहुंचेगा, उसे ही चक्रव्यूह की रचना सिखाई जाएगी।

सभी राजकुमारों को बड़े घड़े दिए जाते, लेकिन अश्वत्थामा को छोटा घड़ा देते ताकि वो जल्दी से भरकर पहुंच सके। सिर्फ अर्जुन ही ये बात समझ पाया और राजकुमार अर्जुन भी जल्दी ही घड़ा भरकर पहुंच जाता।

जब धनुर्विद्या सिखाते समय ब्रह्मास्त्र का उपयोग करने की बारी आई तो उस समय भी द्रोणाचार्य के पास दो ही छात्र पहुंचे थे, अर्जुन और अश्वत्थामा। उस समय अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र की पूरी विधि नहीं सीखी। ब्रह्मास्त्र चलाना तो सीख लिया, लेकिन लौटाने की विधि नहीं सीखी। उसने सोचा गुरु तो मेरे पिता ही हैं, कभी भी सीख सकता हूं।

द्रोणाचार्य ने भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन इसका खामियाजा अश्वथामा को भुगतना पड़ा। महाभारत युद्ध के बाद जब अर्जुन और अश्वत्थामा ने एक-दूसरे पर ब्रह्मास्त्र चलाया तो वेद व्यास के कहने पर अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र लौटा लिया। अश्वत्थामा ने नहीं लौटाया, क्योंकि उसे इसकी विधि पता ही नहीं थी। इस कारण अश्वथामा को श्रीकृष्ण से शाप मिला। उसकी मणि निकाल ली गई और कलियुग अंत तक धरती पर भटकने के लिए छोड़ दिया गया।

अगर द्रोणाचार्य अपने पुत्र मोह पर काबू रखकर उसे भी सही शिक्षा देते और अन्य राजकुमारों के साथ भेदभाव नहीं करते तो शायद अश्वत्थामा को कभी भी इस तरह की सजा नहीं भुगतनी पड़ती।



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