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सोने की और हल्दी की गांठ से बनी गणेश प्रतिमा की पूजा से मिलता है एक समान फल, आंकड़े की जड़ में बन जाती है गणेशजी की आकृति

आज गणेश उत्सव का दूसरा दिन यानी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी है। इस दिन ऋषि पंचमी मनाई जाती है। गणेशजी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने की परंपरा प्रचलित है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार मिट्टी की गणेश प्रतिमा के अलावा श्वेतार्क, हल्दी, गोबर, लकड़ी से बनी मूर्ति की भी पूजा की जाती है। जानिए इन गणेश प्रतिमाओं से जुड़ी खास बातें...

  • आंकड़े की जड़ में बनती है गणेशजी की आकृति
आंकड़े का एक पौधा है। इसमें लगने वाले फूल शिवजी को खासतौर पर चढ़ाए जाते हैं। आंकड़े के जिस पौधे में सफेद फूल लगते हैं, उसकी जड़ में गणेशजी की आकृति बन जाती है। इसे ही श्वेतार्क गणेश कहा जाता है। इस जड़ की सफाई के बाद घर के मंदिर स्थापित किया जाता है। श्रृंगार के बाद पूजा की जाती है।
  • सोने की और हल्दी की गांठ से बनी प्रतिमा का फल एक समान

हल्दी की ऐसी गांठ, जिसमें श्रीगणेश की आकृति दिखाई दे रही है, उसे घर के मंदिर में स्थापित कर सकते हैं। हल्दी की गांठ में गणेशजी का ध्यान करते हुए रोज पूजा करनी चाहिए। पीसी हुई हल्दी में पानी मिलाकर भी गणेश प्रतिमा बना सकते हैं। अगर सोने की गणेश प्रतिमा नहीं है तो हल्दी से बनी गणेश प्रतिमा का पूजन किया जा सकता है। इन दोनों प्रतिमाओं की पूजा का फल एक समान माना गया है।

  • गोबर से बनी मूर्ति भी होती है पूजनीय

गौमाता यानी गाय के गोबर में महालक्ष्मी का वास माना गया है। गोबर यानी गोमय से बनी गणेश मूर्ति की भी पूजा की जा सकती है। गोबर से गणेशजी की आकृति बनाएं और मंदिर स्थापित करें। इसका भी रोज पूजन करना चाहिए।

  • नीम या पीपल की लकड़ी की गणेश प्रतिमा द्वार पर लगाएं
पीपल, आम, नीम की लकड़ी मूर्ति के लिए शुभ मानी गई है। इन पेड़ों की लकड़ी से गणेश प्रतिमा बनवा सकते हैं। ये मूर्ति घर के मुख्य दरवाजे के बाहर ऊपरी हिस्से पर लगानी चाहिए। इससे घर में सकारात्मकता बनी रहती है।


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