12 साल बाद नवरात्रि में गुरु वृश्चिक राशि में और शनि-केतु की युति, कन्या राशि में पांच ग्रह
जीवन मंत्र डेस्क। देवी मां की पूजा का नौ दिवसीय महापर्व नवरात्रि रविवार, 29 सितंबर से शुरू हो रहा है और सोमवार, 7 अक्टूबर को दुर्गा नवमी के साथ समाप्त होगा। कुछ लोग नवमी तिथि पर और कुछ दशमी तिथि पर देवी मां की प्रतिमा का विर्सजन करते हैं। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार नवरात्रि की शुरुआत में कन्या राशि में पांच बड़े ग्रहों की युति बनी हुई है। 12 साल बाद नवरात्रि में गुरु ग्रह वृश्चिक राशि में रहेगा।
कन्या राशिमें हैं ये पांच ग्रह
29 सितंबर की सुबह कन्या राशि में सूर्य, मंगल, बुध, शुक्र और चंद्र स्थित रहेंगे। इन पांच ग्रहों की युति में नवरात्रि की शुरुआत होगी। इनके अलावा गुरु वृश्चिक राशि में और शनि-केतु की युति धनु राशि में है। राहु मिथुन में है। 12 वर्ष पहले गुरु के वृश्चिक में रहते और शनि-केतु की युति में 12 अक्टूबर 2007 से नवरात्रि की शुरुआत हुई थी। उस समय शनि-केतु की युति सिंह राशि में थी। कुछ मतों के अनुसार इस बार सर्पयोग भी रहेगा। इस नवरात्रि में महाकाली की पूजा विशेष फलदायक रहती है।
ये शुभ योग भी बनेंगे
रविवार, 29 सितंबर को पूरे दिन सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि योग रहेगा। इन योगों में शुरू किए गए शुभ काम जल्दी सफल होते हैं। इस नवरात्रि में माता रानी हाथी की सवारी करके आएंगी। अगर सोमवार को माता को विदा करेंगे, तब वे महिष वाहन पर विदा लेंगी। जबकि मंगलवार को विदा होने पर देवी मां पैरो में बिना कुछ धारण किए विदा होंगी। हाथी पर आने की वजह से ये नवरात्रि व्यापारियों के लिए लाभदायक रहने वाली है, लेकिन माता का नंगे पैर जाना अशुभ माना गया है। ऐसा होने पर प्राकृतिक आपदा आने की संभावनाएं रहती हैं।
ये हैं नौ दिन की नौ देवियां
प्रतिपदा को शैलपुत्री, द्वितीया को ब्रह्मचारिणी, तृतीया को चंद्रघंटा, चतुर्थी को कुष्मांडा, पंचमी को स्कंदमाता, षष्ठी को कात्यायनी, सप्तमी की कालरात्री, अष्टमी को महागौरी और नवमी को सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। प्रतिपदा तिथि (29 सितंबर) पर घटस्थापना के लिए ब्रह्म मुहूर्त शुभ माना गया है। 3 अक्टूबर को ललिता पंचमी, 6 को महाष्टमी व 7 अक्टूबर को महानवमी का पर्व मनाया जाएगा। 2 से 10 साल की कन्याओं का पूजन नवदुर्गा के स्वरूप में करने का वर्णन पुराणों में मिलता है। अष्टमी व नवमी को कुलदेवी व विशेष पूजा का भी विधान है।
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