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विनोद खन्ना को लेकर उनके बेटे अक्षय ने कहा - सत्य की खोज में ओशो की शरण में गए थे पापा

बॉलीवुड डेस्क. दिवंगत अभिनेता विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को हुआ था। उनकी 73वीं बर्थ एनिवर्सरी पर उनके बेटे अक्षय खन्ना ने उनसे जुड़े कुछ अनजाने पहलुओं पर चर्चा की। इस दौरान उन्होंने यह भी बताया कि आखिर क्यों विनोद ओशो की शरण में चले गए थे।

  1. विनोद खन्ना के बारे में बताते हुए अक्षय ने कहा, "मेरी जिंदगी में पापा का दर्जा एक टीचर का भी रहा है। उनकी राय का सम्मान करते हुए, उनका अनुशरण करते हुए ही मैं यहां तक पहुंचा हूं। वे सुपरस्टार तो थे ही। साथ ही उनमें एक मासूम और नाजुक शख्सियत भी बसती थी। वे जिंदगी के अबूझ सवालों के जवाब में भटकते रहे।

    विनोद खन्ना।

    - वे जानना चाहते थे कि हम-आप, बाकी सब आखिर आए कहां से हैं। जब वे करियर की पीक पर थे, तब सत्य की खोज में उन्होंने इंडस्ट्री छोड़कर ओशो की शरण ली थी। जब वहां से लौटे तो उन्होंने फिल्म 'इंसाफ' से जोरदार कमबैक किया। उसके बाद की इनिंग भी उन्होंने बहुत बढ़िया खेली, जो कि अमूमन होता नहीं है। इस किस्म की फाइटिंग स्पिरिट सबमें नहीं होती।"

  2. 1982 में विनोद खन्ना ने पत्नी गीतांजलि और दोनों बेटों अक्षय और राहुल के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें सबको सकते में डालते हुए कहा कि अपने गुरु ओशो के कहने पर वो इंडस्ट्री छोड़ रहे हैं। उन्होंने अपना नाम स्वामी विनोद भारती रख लिया था। विनोद ने फिल्मों के साइनिंग अमाउंट भी लौटा दिए थे। शूटिंग तो बिल्कुल बंद कर दी थी। विनोद खन्ना ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'मैं ओशो के बगीचे की रखवाली करता, टॉयलेट साफ करता, खाना बनाता था और ओशो के कपड़े मुझ पर ट्राय किए जाते, क्योंकि हमारी कद-काठी एक थी।'

    विनोद खन्ना।
  3. 5 साल के संन्यास पर जाने से पहले विनोद मंडे से फ्राइडे शूटिंग करते और वीकेंड पर ओशो के आश्रम में वक्त बिताया करते थे। अक्षय कहते हैं, "ओशो के विचारों का जैसा पापा पर असर था, वैसा ही गहरा असर मुझ पर भी है। जब भी मौका मिलता है, मैं उनको सुनता हूं। उनकी कुछ बातों से मैं सहमत हूं और कइयों से असहमत हूं।"

  4. अक्षय बताते हैं, "बहरहाल, पापा के बारे में सरल शब्दों में कहूं तो वे मोह माया से परे इंसान थे। चीजों को जकड़कर नहीं रखते थे। लार्जर दैन लाइफ सफलता देखने के बावजूद उन्होंने कभी हम पर अपनी मर्जी नहीं थोपी। इस मामले में वे काफी यूनिक थे। ज्यादातर लोग झट से एडवाइस दे देते हैं। पापा दूर-दूर तक ऐसे नहीं थे। वे ऐसे मामलों में इरादतन चुप ही रहते थे। अगर मैं उनसे सवाल पूछता तो जवाब जरूर देते थे, पर वे अपनी ओर से शेखी बघारने में यकीन नहीं रखते थे। वे जियो और जीने दो में यकीन रखने वाले इंसान थे।"

    विनोद खन्ना।
  5. बकौल अक्षय, "वे यारी निभाने में बड़ा यकीन रखते थे। भट्ट (महेश) साहब के साथ उनकी काफी बनती थी। इतनी ज्यादा कि पापा अपने जानने वाले प्रोड्यूसरों को भट्ट साहब का नाम रेफर करते थे। इस फैक्ट के बावजूद कि दोनों की पहली फिल्म 'मुक्ति' फाइनेंस की कमी के चलते बन नहीं पाई थी। लेकिन उसके चंद सालों बाद ही पापा ने एक प्रोड्यूसर को उनका नाम रेफर किया और दोनों ने साथ में 'लहू के दो रंग' फिल्म बनाई। वह फिल्म हांगकांग में शूट हुई थी और बॉक्स ऑफिस पर खासी हिट रही थी।"

    (जैसा अमित कर्ण को बताया)



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      अक्षय खन्ना और विनोद खन्ना।


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