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रावण ने की थी इस मंदिर की स्थापना, शिव-शक्ति पूजा के लिए माना जाता है खास

जीवन मंत्र डेस्क. श्रीलंका का शंकरी देवी मंदिर है हिंदुओं का खासकर तमिलभाषी हिंदुओं की आस्था का केंद्र रहा है। यह मंदिर कोलंबो से 250 किमी दूर त्रिकोणमाली नाम की जगह पर चट्टान पर बना है।यहां सती के शरीर का उसंधि (पेट और जांघ के बीच का भाग) हिस्सा गिरा था। इसलिए इस मंदिर को शक्तिपीठ माना गया। कुछ ग्रंथों में यहां सती का कंठ और नूपुर गिरने का उल्लेख भी है। यहां की शक्ति इन्द्राक्षी तथा भैरव राक्षसेश्वर हैं। इतिहास में इस मंदिर पर कई बार हमले हुए, जिनसे मंदिर का स्वरूप बदलता रहा, लेकिन प्रतिमा को हर बार बचा लिया गया।

आदि शंकराचार्य के 18 महाशक्तिपीठों में से एक यह स्थान

मान्यता है कि शंकरी देवी मंदिर की स्थापना खुद रावण ने की थी। इस जगह का उल्लेख आदि शंकराचार्य द्वारा निश्चित 18 महा-शक्तिपीठों में भी किया गया है। यहां शिव का मंदिर भी है, जिन्हें त्रिकोणेश्वर या कोणेश्वरम कहा जाता है। इसलिए इस स्थान का महत्व शिव और शक्ति, दोनों की पूजा में है। चोल और पल्लव राजाओं ने इस मंदिर में काफी काम कराया। दरअसल, इस भव्य मंदिर को 17वीं शताब्दी में पुर्तगाली आक्रमणकारियों ने ध्वस्त कर दिया था, जिसके बाद मंदिर के एकमात्र स्तंभ के अलावा यहां कुछ भी नहीं था। स्थानीय लोगों के मुताबिक, दक्षिण भारत के तमिल चोल राजा कुलाकोट्टन ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया, तो 1952 में श्रीलंका में रहने वाले तमिल हिंदुओं ने इसे वर्तमान स्वरूप दिया। त्रिकोणमाली आने वाले लोग इसे शांति का स्वर्ग भी कहते हैं। यह मंदिर त्रिकोणमाली जिले की 1 लाख हिंदू आबादी की आस्था का भी केंद्र है। दोनों ही नवरात्र पर यहां कई विशेष आयोजन होते हैं, जिसमें श्रीलंका के अलावा भारत (खासकर तमिलनाडु) से श्रद्धालु भी आते हैं। फिलहाल यहां पहुंचने वालों की संख्या रोजाना 500 से 1000 के बीच है, लेकिन अष्टमी और नवमी पर भीड़ बढ़ जाती है। फिलहाल तेज बारिश के चलते यहां पहुंचने में श्रद्धालुओं को कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।



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Shankari devi Temple: Ravana Established This Temple, it is Special Shakti Peeth for Shiva Shakti Puja


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