अशांत मन से भक्ति नहीं हो सकती, ऐसे कामों से बचना चाहिए जो चिंता बढ़ाते हैं
जीवन मंत्र डेस्क. रविवार, 9 फरवरी को माघ मास की पूर्णिमा है। इस तिथि पर संत रविदास की जयंती मनाई जाती है। संत रविदास ने कई ऐसे सूत्र बताए हैं, जिनसे जीवन के दुख दूर हो सकते हैं और जीवन में सुख बना रहता है। उनके जीवन से जुड़े की प्रेरक प्रसंग भी प्रचलित हैं। यहां जानिए रविदासजी का एक चर्चित प्रसंग, इस प्रसंग के अनुसार एक महात्मा ने उन्हें पारस पत्थर दिया था।
चर्चित प्रसंग के अनुसार संत रविदास जरूरतमंद लोगों की और सभी संत-महात्माओं की सेवा करते थे। वे जूते-चप्पल बनाने का काम करते थे। एक दिन उनकी कुटिया में एक महात्मा आए। रविदासजी ने महात्माजी को भोजन करवाया और अपने बनाए हुए जूते पहनाए।
इस निस्वार्थ सेवा और प्रेम से प्रसन्न होकर महात्माजी ने संतश्री को एक पारस पत्थर दिया। इस पत्थर को जैसे ही लौहे के औजारों पर लगाया तो वे सभी सोने के हो गए। रविदासजी इससे दुखी हो गए और उन्होंने वह पत्थर लेने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि अब मैं सोने के इन औजारों से जूते-चप्पल कैसे बनाउंगा?
महात्माजी ने रविदास से कहा कि इस पत्थर से तुम बहुत धनवान बन सकते हो, तुम्हें कभी भी धन की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। धन आने के बाद तुम्हें जूते-चप्पल बनाने की भी जरूरत ही नहीं है। तुम धन से दूसरों की मदद भी कर सकते हो। जब चाहो इसका उपयोग कर लेना। ये कहकर महात्माजी ने पारस पत्थर उसी कुटिया में एक जगह सुरक्षित रख दिया और वहां से चले गए।
करीब एक साल के बाद फिर से महात्माजी संत रविदास की कुटिया पहुंचे। उन्होंने देखा कि रविदास और कुटिया की हालत वैसी की वैसी ही है, जैसी पिछले साल थी। उन्होंने हैरान होकर पूछा कि वह पारस पत्थर कहां है?
संत रविदास ने कहा कि वह पत्थर तो वहीं होगा, जहां आपने रखा था। महात्माजी ने कहा कि तुम्हारे पास इतना अच्छा अवसर था, तुम धनवान बन सकते थे, इसका उपयोग क्यों नहीं किया?
रविदासजी ने जवाब कि गुरुजी मैं उससे बहुत सारा सोना बना लेता और धनवान हो जाता तो मुझे धन की चिंता रहती, कहीं कोई ये चुरा न ले। इसकी देखभाल करनी पड़ती। धन की वजह से चिंता बढ़ जाती। अगर में धन का दान करता तो बहुत ही जल्दी ये बात पूरे क्षेत्र में फैल जाती। लोग दान लेने के लिए मेरे घर के बाहर खड़े रहते। इतना सब होने के बाद मैं भगवान की भक्ति में मन नहीं लगा पाता। मैं तो जूते बनाने के काम से ही प्रसन्न हूं, क्योंकि इस काम से मेरे खाने-पीने की पर्याप्त व्यवस्था हो जाती है और बाकी समय में मैं भक्ति कर लेता हूं। अगर धनी हो जाता और प्रसिद्धि मिल जाती तो मेरे जीवन की शांति खत्म हो जाती। मुझे तो जीवन में शांति चाहिए, ताकि मैं भक्ति कर सकूं। इसी वजह से मैंने पारस पत्थर का उपयोग नहीं किया।
प्रसंग की सीख
इस प्रसंग की सीख यह है कि अगर हमारा मन अशांत रहेगा तो हम भक्ति नहीं कर सकते हैं। इसीलिए ऐसे कामों से बचना चाहिए, जिससे हमारी चिंताएं बढ़ती हैं। तभी हम सुखी रह सकते हैं और पूरी एकाग्रता के साथ भगवान का स्मरण कर सकते हैं।
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