द्रौपदी ने भीष्म पितामह से पूछा कि जब मेरा चीर हरण हो रहा था, तब आप चुप क्यों थे?
जीवन मंत्र डेस्क. महाभारत से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। इन कथाओं में जीवन को सुखी बनाने के सूत्र बताए गए हैं। यहां जानिए एक ऐसी कथा, जिसका संदेश ये है कि हमें अधर्मी लोगों से क्यों दूर रहना चाहिए...
प्रचलित कथा के अनुसार कौरव और पांडवों का युद्ध अंतिम चरण में था। कौरव सेना के लगभग सभी महारथी पांडवों के हाथों पराजित हो चुके थे। भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे थे। उस समय एक दिन युद्ध विराम के बाद सभी पांडव और द्रौपदी भीष्म पितामह से मिलने पहुंचे।
भीष्म पांडवों को धर्म-अधर्म की, नीतियों की और ज्ञान की बातें बता रहे थे। तब द्रौपदी ने कहा कि पितामह आज आप ज्ञान की बातें कर रहे हैं, लेकिन जिस दिन भरी सभा में मेरा चीर हरण हो रहा था, आप भी वहां थे, तब आपका ये ज्ञान कहां गया था, आप उस समय चुप क्यों रहे, मेरी मदद क्यों नहीं की, आपके सामने अधर्म हो रहा था, लेकिन आप कुछ भी क्यों नहीं कर सके?
भीष्म पितामह ने कहा कि पुत्री मैं जानता था, एक दिन मुझे इन सवालों के जवाब जरूर देना पड़ेंगे, जिस दिन ये अधर्म हो रहा था, उस दिन भी मेरे मन में यही प्रश्न चल रहे थे।
उस समय मैं दुर्योधन का दिया अन्न खा रहा था। वह अन्न जो पाप कर्मों के कमाया हुआ था। ऐसा अन्न खाने की वजह से मेरा मन-मस्तिष्क दुर्योधन के अधीन हो गया था। मैं ये सब रोकना चाहता था, लेकिन दुर्योधन के अन्न ने मुझे रोक दिया और ये अनर्थ हो गया।
द्रौपदी ने कहा कि आज आप ज्ञान की बातें कैसे कर रहे हैं?
भीष्म ने जवाब दिया कि अर्जुन के बाणों से मेरे शरीर से सारा रक्त बह गया। ये रक्त भी दुर्योधन के दिए अन्न से ही बना था। अब मेरे शरीर में रक्त नहीं है, मैं दुर्योधन के अन्न के प्रभाव से मुक्त हो गया हूं, इसीलिए आज ज्ञान की ये बातें कर पा रहा हूं। भीष्म की ये बातें सुनकर द्रौपदी संतुष्ट हो गईं और उसने भीष्म पितामह को प्रणाम किया।
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