श्रीराम और सुग्रीव का प्रसंग, सच्ची मित्रता में मित्रों के सुख-दुख एक ही होते हैं
रामायण के किष्किंधा कांड में सुग्रीव हनुमानजी, जामवंत और अपने कुछ वानर साथियों के साथ किसी तरह अपने प्राण बचाकर एक गुफा में छिपे थे। जब सुग्रीव ने दो राजकुमारों को देखा तो उन्होंने हनुमानजी को उनके पास उनका परिचय जानने के लिए भेजा, उस समय हनुमानजी वेश बदलकर दोनों राजकुमारों से मिलने पहुंचे। ये दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण थे।
हनुमानजी ने अपनी बुद्धिमता और वाणी-कौशल से पहली भेंट में ही श्रीराम को प्रभावित कर लिया था। श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं कि ये निश्चित ही ज्ञानी हैं। हनुमानजी ने सुग्रीव और श्रीराम की मित्रता करवाई।
इस प्रसंग में श्रीराम ने कहा है कि उपकार ही मित्रता का फल है। मित्र एक-दूसरे का भला करते हैं यानी एक-दूसरे पर उपकार करते हैं। मित्र एक-दूसरे को सभी कष्टों से मुक्ति दिलाते हैं। श्रीराम और सुग्रीव अग्नि को साक्षी बनाकर मित्रता करते हैं। सुग्रीव श्रीराम से कहते हैं कि आप मेरे प्रिय मित्र हैं। आज से हम दोनों के दुख और सुख एक हैं।
श्रीराम को सीता की खोज करनी थी और सुग्रीव को अपना राज्य और पत्नी वापस प्राप्त करनी थी। बाली से युद्ध के लिए सुग्रीव को श्रीराम की जरूरत थी और श्रीराम सीता की खोज के लिए वानर सेना की जरूरत थी। इस प्रकार दोनों से मित्रता करके एक-दूसरे की मदद करने का संकल्प लिया। इस प्रसंग की सीख यही है कि सच्ची मित्रता में मित्रों के सुख-दुख एक ही होते हैं।
इस प्रसंग में सुग्रीव और श्रीराम की मित्रता की शुरुआत हनुमानजी की उपस्थिति में हुई। जिस कार्य की शुरुआतहनुमानजी के साथ होती है, वह काम अवश्य सफल होता है। इसीलिए किसी भी काम की शुरुआत में हनुमानजी का ध्यान जरूर करना चाहिए। ऐसा करने से सभी काम बिना बाधा के पूरा हो सकता है।
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