हिमाचल प्रदेश का यमराज मंदिर, मान्यता है कि यहां चित्रगुप्त बताते हैं आत्मा के कर्मों का हिसाब
जीवन मंत्र डेस्क। मंगलवार, 29 अक्टूबर को दीपोत्सव का अंतिम दिन भाई दूज है। मान्यता है कि इस तिथि पर यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने आते हैं। इसी वजह से भाई दूज पर यमराज की विशेष पूजा की जाती है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार मनुष्यों के कर्मों को विधाता लिखते हैं, चित्रगुप्त बांचते हैं, मृत्यु के बाद यमदूत मनुष्य की आत्मा को पकड़कर लाते हैं और यमराज दंड देते हैं।
यमराज के कोप से बचने के लिए भाई दूज पर यमराज के मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगी रहती है। यमराज का प्राचीन मंदिर हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में भरमौर नामक जगह पर स्थित है। ये मंदिर एक घर की तरह दिखाता है।
यमराज और चित्रगुप्त के अलग-अलग कमरे
इस जगह को लेकर मान्यता है कि यहीं पर जगह है जहां पर यमराज व्यक्ति के कर्मों का फैसला करते हैं। यह मंदिर देखने में एक घर की तरह दिखाई देता है, जहां एक खाली कमरा मौजूद है। मान्यता है इस कमरे में ही भगवान यमराज विराजमान हैं। यहां पर एक और कमरा है, जिसे चित्रगुप्त का कक्ष कहा जाता है।
यमराज की कचहरी
मंदिर से मान्यता जुड़ी है कि जब किसी की मृत्यु होती है, तब यमराज के दूत उस व्यक्ति की आत्मा को पकड़कर सबसे पहले इस मंदिर में चित्रगुप्त के सामने प्रस्तुत करते हैं। चित्रगुप्त आत्मा को उसके कर्मों के बारे में बताते हैं। इसके बाद चित्रगुप्त के सामने वाले कमरे में आत्मा को ले जाया जाता है। इस कमरे को यमराज की कचहरी कहा जाता है। यहां पर यमराज कर्मों के अनुसार आत्मा को अपना फैसला सुनाते हैं।
चार अदृश्य द्वार
इस क्षेत्र में माना जाता है कि मंदिर में चार अदृश्य द्वार हैं जो स्वर्ण, रजत, तांबा और लोहे के बने हैं। यमराज के फैसले के बाद यमदूत आत्मा को कर्मों के अनुसार इन्हीं द्वारों से स्वर्ग या नर्क में ले जाते हैं। गरुड़ पुराण में भी यमराज के दरबार में चार दिशाओं में चार द्वार का उल्लेख मिलता है।
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