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मंगलवार को भैरव अष्टमी पर सिंदूर और तेल से करें भगवान का श्रृंगार और बोलें भैरव मंत्र

जीवन मंत्र डेस्क। मंगलवार, 19 नवंबर को काल भैरव अष्टमी है। प्राचीन काल में अगहन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर भगवान शिव ने काल भैरव के रूप में अवतार लिया था। इसी वजह से इस तिथि पर काल भैरव की विशेष पूजा की जाती है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार जानिए कुछ ऐसी बातें जो कालभैरव अष्टमी पर ध्यान रखनी चाहिए...
ऐसे करें काल भैरव की पूजा

  • भैरव अवतार प्रदोष काल यानी दिन-रात के मिलन की घड़ी में हुआ था। इसीलिए भैरव पूजा शाम और रात के समय करना ज्यादा शुभ माना गया है। काल भैरव अष्टमी पर स्नान के बाद किसी भैरव मंदिर जाएं। सिंदूर, सुगंधित तेल से भैरव भगवान का श्रृंगार करें। लाल चंदन, चावल, गुलाब के फूल, जनेऊ, नारियल अर्पित करें। तिल-गुड़ या गुड़-चने का भोग लगाएं। सुगंधित धूप बत्ती और सरसों के तेल का दीपक जलाएं। इसके बाद भैरव मंत्र का जाप करें।

धर्मध्वजं शङ्कररूपमेकं शरण्यमित्थं भुवनेषु सिद्धम्। द्विजेन्द्र पूज्यं विमलं त्रिनेत्रं श्री भैरवं तं शरणं प्रपद्ये।।

  • इस दिन आप भैरव गायत्री मंत्र का जाप भी कर सकते हैं...

ऊँ शिवगणाय विद्महे। गौरीसुताय धीमहि। तन्नो भैरव प्रचोदयात।।

  • मंत्र का जाप कम से कम 108 बार करें, इसके बाद भैरव भगवान के सामने धूप, दीप और कर्पूर जलाएं, आरती करें, प्रसाद ग्रहण करें। भैरव भगवान के वाहन कुत्तों को प्रसाद और रोटी खिलाएं।
  • रुद्राक्ष शिवजी का स्वरूप है। इसलिए भैरव पूजा में रुद्राक्ष की माला पहनना चाहिए। रुद्राक्ष की माला से भैरव मंत्रों का जाप करना चाहिए।
  • भैरव पूजा में ऊँ भैरवाय नम: बोलते हुए चंदन, चावल, फूल, सुपारी, दक्षिणा, नैवेद्य लगाकर धूप-दीप जलाएं। भैरव भगवान के साथ ही शिवजी और माता-पार्वती की भी पूजा जरूर करें। इस दिन अधार्मिक कामों से बचना चाहिए।


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